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दिवाली पूजा विधि: पंचांग, शुभ मुहूर्त और लक्ष्मी-गणेश पूजन

आचार्य पवन शर्मा · 4 नवंबर 2026

दिवाली प्रकाश, स्वच्छता, कृतज्ञता और सद्भाव का पर्व है। इस अवसर पर अनेक परिवार लक्ष्मी-गणेश पूजन करते हैं और घर में दीप जलाते हैं। पंचांग की दृष्टि से मुख्य लक्ष्मी पूजा का संबंध अमावस्या तिथि और सायंकालीन प्रदोष काल से है। फिर भी सही दिन और समय समझने के लिए स्थानीय तिथि-व्याप्ति तथा पारिवारिक परंपरा देखना आवश्यक है। यहाँ दिवाली पूजा विधि को सरल रूप में समझाया गया है, ताकि तैयारी श्रद्धापूर्वक हो, अनावश्यक भय या दिखावे के साथ नहीं।

1. दिवाली का पंचांग: अमावस्या और प्रदोष काल

उत्तर भारत की प्रचलित पूर्णिमांत मास-गणना में दिवाली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है। कई अमांत पंचांगों में यही अमावस्या आश्विन मास की कही जाती है। यह मास के नाम का अंतर है; केवल इस आधार पर त्योहार की तिथि अलग नहीं माननी चाहिए।

तिथि सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक निश्चित रूप से नहीं चलती। वह दिन या रात में किसी भी समय शुरू और समाप्त हो सकती है। इसलिए दिवाली का निर्णय केवल कैलेंडर की तारीख या सूर्योदय के समय उपस्थित तिथि देखकर करना पर्याप्त नहीं होता। लक्ष्मी पूजा में प्रदोष के समय अमावस्या की उपलब्धता विशेष रूप से देखी जाती है।

  • प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास से आरंभ होने वाला सायंकालीन समय है; इसकी गणना स्थानीय सूर्यास्त के आधार पर होती है।
  • अनेक मुहूर्त परंपराएँ उपलब्ध पूजा-अवधि में स्थिर लग्न को भी प्राथमिकता देती हैं। सायंकाल में उपलब्ध होने पर वृषभ लग्न अक्सर चुना जाता है।
  • कुछ परंपराओं में निशीथ काल का महत्त्व है, लेकिन सामान्य गृहस्थ पूजन के लिए आधी रात तक जागना अनिवार्य नहीं है।
  • अमावस्या दो दिनों के प्रदोष को स्पर्श करे या किसी में स्पष्ट रूप से उपलब्ध न हो, तो विशेष पर्व-निर्णय नियम देखने पड़ते हैं।

किसी वर्ष का निश्चित मुहूर्त बताने के लिए वर्ष और नगर दोनों चाहिए। दूसरे शहर का समय बिना जाँच अपनाने के बजाय विश्वसनीय स्थानीय पंचांग देखें।

2. पूजा की तैयारी और आवश्यक सामग्री

पूजा से पहले घर और पूजा-स्थान की सामान्य सफाई करें। उद्देश्य व्यवस्थित, शांत और स्वागतपूर्ण वातावरण बनाना है; महंगी सजावट या नई वस्तुएँ खरीदना आवश्यक नहीं। स्नान करके साफ वस्त्र पहनें और ऐसी जगह बैठें जहाँ परिवार सहजता से पूजा कर सके।

एक साफ चौकी पर वस्त्र बिछाकर लक्ष्मी और गणेश का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। यदि परिवार में लक्ष्मी-नारायण, बही-खाता या अन्य विशिष्ट पूजन की परंपरा है, तो उसे भी सम्मिलित किया जा सकता है।

  • लक्ष्मी-गणेश का चित्र या प्रतिमा, चौकी और साफ वस्त्र।
  • दीपक, तेल या घी, बत्ती तथा सुरक्षित दीप-पात्र।
  • जलपात्र, रोली या चंदन, अक्षत और पुष्प।
  • फल, मिठाई या घर में बना सात्त्विक नैवेद्य।
  • धूप, आरती की थाली और उपलब्ध होने पर घंटी।
  • कलश, नारियल और पत्ते, यदि आपकी परंपरा में कलश-स्थापना होती है।

किसी सामग्री का उपलब्ध न होना पूजा को निरर्थक नहीं बनाता। सरल पूजन भी किया जा सकता है। चित्रों, कागजी सजावट और वस्त्रों को दीपक की लौ से पर्याप्त दूरी पर रखें।

3. दिवाली की सरल लक्ष्मी-गणेश पूजा विधि

यह सामान्य घरेलू पूजन का क्रम है। अलग क्षेत्रों और परिवारों में क्रम तथा उपचार बदल सकते हैं। वैदिक मंत्रों सहित विस्तृत अनुष्ठान करवाना हो, तो प्रशिक्षित पुरोहित का मार्गदर्शन लेना उचित है।

संकल्प और गणेश पूजन

शांत होकर बैठें और अपने आराध्य का स्मरण करें। संकल्प में अपना नाम, स्थान तथा परिवार के कल्याण, सद्बुद्धि और धर्मसम्मत आजीविका की भावना व्यक्त करें। तिथि या संवत् की जानकारी न हो तो अनुमान लगाकर बोलने के बजाय सरल हिंदी में प्रार्थना कर सकते हैं।

दीप प्रज्वलित करें और गणेशजी को पुष्प, चंदन या रोली तथा नैवेद्य अर्पित करें। “ॐ गं गणपतये नमः” का श्रद्धापूर्वक जप कर सकते हैं। सरल घरेलू नाम-स्मरण के लिए कोई बड़ी निश्चित संख्या आवश्यक नहीं है।

कलश और लक्ष्मी पूजन

यदि कलश-स्थापना आपकी परंपरा का हिस्सा है, तो स्वच्छ पात्र में जल भरकर स्थापित करें। उसके ऊपर पत्ते और नारियल रखने की प्रथा अनेक परिवारों में है। कलश के निकट दीपक इस प्रकार रखें कि पत्तों या सजावट तक आग न पहुँचे।

माता लक्ष्मी का ध्यान करें और चित्र या प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करें। धातु की उपयुक्त प्रतिमा हो तो परंपरा के अनुसार हल्का स्नान कराया जा सकता है। कागज के चित्र, विद्युत सज्जा वाली मूर्ति या पानी से खराब होने वाली प्रतिमा पर जल न डालें।

  • चंदन या रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
  • धूप और दीप दिखाएँ; धुएँ से असुविधा हो तो धूप का प्रयोग सीमित रखें।
  • फल, मिठाई या घर का नैवेद्य अर्पित करें।
  • “ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः” का स्मरण करते हुए संतोष, सदाचरण और विवेक की प्रार्थना करें।

यदि घर में लक्ष्मी-नारायण पूजन होता है, तो उसी क्रम को बनाए रखें। व्यापारिक बही-खातों या कार्य-साधनों का पूजन कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदार व्यवहार के संकल्प के साथ किया जा सकता है।

आरती और समापन

लक्ष्मीजी और गणेशजी की प्रचलित आरती करें। फिर अपनी भाषा में प्रार्थना और भूल-चूक के लिए क्षमा-याचना करें। परिवार के साथ प्रसाद बाँटें। पूजा का समापन किसी निश्चित धनलाभ की माँग तक सीमित न रखकर सहयोग, संयम और शुभ आचरण के संकल्प से करें।

4. ज्योतिषीय महत्त्व: मुहूर्त सहायक है, गारंटी नहीं

ज्योतिष में मुहूर्त का उद्देश्य किसी कार्य के लिए समय की अनुकूलता देखना है। दिवाली पर अमावस्या, प्रदोष और लग्न की चर्चा इसी संदर्भ में होती है। स्थिर लग्न की प्राथमिकता स्थिरता की प्रतीकात्मक और मुहूर्त-संबंधी भावना से जुड़ी है; इससे आर्थिक परिणाम सुनिश्चित नहीं होते।

पंचांग के पाँच अंग तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण हैं। लेकिन पर्व-पूजन का निर्णय करते समय उस पर्व के विशिष्ट नियम भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। किसी सामान्य दैनिक संकेत को देखकर दिवाली की पूरी पूजा-अवधि को अशुभ घोषित करना उचित नहीं है।

इसी तरह, केवल जन्मराशि के आधार पर यह कहना कि किसी व्यक्ति की लक्ष्मी पूजा सफल नहीं होगी, संतुलित ज्योतिषीय दृष्टि नहीं है। सभी श्रद्धापूर्वक पूजा कर सकते हैं। व्यक्तिगत कुंडली में धनभाव या ग्रहयोगों का विचार अलग विषय है; पर्व-पूजन उसका विकल्प नहीं है।

दिवाली के नाम पर बिना व्यक्तिगत परीक्षण के महंगे रत्न, गुप्त अनुष्ठान या निश्चित धनवृद्धि वाले उपाय सुझाने से बचना चाहिए। आर्थिक जीवन में बजट, कौशल और जिम्मेदार निर्णयों का अपना स्वतंत्र महत्त्व है।

5. दीपदान, दान और पारिवारिक परंपराएँ

दिवाली का उत्सव केवल मुख्य पूजा तक सीमित नहीं है। आसपास के दिनों में धनतेरस, नरक चतुर्दशी, गोवर्धन पूजा और भाई दूज जैसे पर्व आते हैं। तिथियों की व्याप्ति और क्षेत्रीय परंपरा के कारण उनका क्रम या नागरिक तारीख बदल सकती है। प्रत्येक पर्व का निर्णय अलग देखकर करें।

  • प्रवेश-द्वार और पूजा-स्थान पर दीप ऐसे रखें कि आने-जाने का रास्ता बाधित न हो।
  • दीपक जलाकर घर से बाहर न निकलें और उन्हें बिना निगरानी रातभर न छोड़ें।
  • बच्चों और पालतू पशुओं को खुली लौ से दूर रखें।
  • सामर्थ्य के अनुसार भोजन, वस्त्र या उपयोगी वस्तुओं का सम्मानपूर्वक दान करें।
  • दूसरों की सजावट या खर्च देखकर अपने परिवार पर अतिरिक्त खरीदारी का दबाव न डालें।

कुछ क्षेत्रों में इस रात काली पूजा या अन्य विशिष्ट उपासना की प्रमुखता होती है। अपनी कुल-परंपरा का सम्मान करें। किसी दूसरी परंपरा को गलत बताना या विशेष साधना बिना योग्य मार्गदर्शन अपनाना आवश्यक नहीं है।

6. दिवाली पूजा से जुड़े सामान्य प्रश्न

क्या बिना पंडित के दिवाली पूजा कर सकते हैं?

हाँ, सामान्य घरेलू पूजा साफ-सफाई, दीप, पुष्प, नैवेद्य और सरल प्रार्थना के साथ स्वयं कर सकते हैं। विस्तृत वैदिक कर्मकांड या विशेष पारिवारिक अनुष्ठान के लिए पुरोहित का सहयोग उपयोगी है।

शुभ मुहूर्त छूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। संभव हो तो स्थानीय परंपरा के अनुसार उपलब्ध पूजा-अवधि में शांत मन से पूजन करें। परिस्थितिवश समय चूकने को अनिष्ट का निश्चित संकेत नहीं मानना चाहिए।

क्या हर वर्ष नई लक्ष्मी-गणेश प्रतिमा खरीदनी चाहिए?

यह सार्वभौमिक अनिवार्यता नहीं है। घर की स्वच्छ और पूजित स्थायी प्रतिमा से पूजा की जा सकती है। प्रतिमा बदलने की पारिवारिक परंपरा हो तो पुरानी प्रतिमा का सम्मानजनक और पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन करें।

क्या पूजा में चाँदी का सिक्का रखना जरूरी है?

नहीं। सिक्के रखने की प्रथा कई परिवारों में है, लेकिन चाँदी या सोने की खरीद पूजा की शर्त नहीं है। उपलब्ध सामग्री और अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजन करें।

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